इक ग़ज़ल ब-नजर -ए- इस्लाह
महोब्बत में सलीका चाहता है
अजब पागल है दिल क्या चाहता है।
कफस से वो हमे आज़ाद कर के
हमारे पर कतरना चाहता है।
जुनूं इसमें भी है सच्चाइयों का
हमारा सर भी नेजा चाहता है
इजाजत माँगता है इस जहाँ से
अगर मजलूम मरना चाहता है।
उसे चाहत है बस ज़ज्बात ए दिलकी
कहाँ वो सिर्फ सजदा चाहता है।
गुलामी की इसे आदत पड़ी है
हमेशा सर पे पंजा चाहता है।
बहुत पागल है ये महबूब तेरा
जमाने को बदलना चाहता है।
महेबुब सोनालिया
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